Thursday, December 13, 2012

आज फिर

आज फिर बहुत दिनों बाद
बेठा हूँ कागज, कलम और मदिरा के साथ
इस उम्मीद में की कुछ लिखूंगा

अब थोड़ा  सुरूर सा चड़ने लगा है
विचारों और ख्यालों का पोथा खुलने लगा है
अब शब्द कविता का रूप लेंगे



होश में ये दूनिया  बेमानी लगती है
छल कपट की धनि लगती है
इस पे भरोसा नहीं













Tuesday, August 28, 2012

लकीरें


लकीरों और तकदीरों में अजब मेल होता है 
हमारे हाथों में भी मुक्कमल खेल होता है 
एक पतली सी रेखा बदलती है जिंदगानी का रुख 
क्या कोई सच भी संगीन होता है 


एक बार ह्रदय रेखा ने भाग्य रेखा से लड़ना चाहा 
हकीक़त को छोड़ मोहब्बत में पड़ना चाहा 


भाग्य रेखा लेकिन चुप न बेठी 
हमें हकीक़त से नज़रें चुराने की सज़ा देने की ठानी 
भावो के समंदर दिखाए
जज्बातों के सैलाब लाये 

ये सब देख माथे की रेखा रो पड़ी 
शिखन पड़ने लगी विचारों की 
पहली बार उसने दिल का हाथ थामा 
दिल के अल्हड़पन का कारण खुद को माना 

पर देर हुई अब 
भाग्य ने लिख दी कहानी सारी जब 
दिल हार बेठा किस्मत से 
दिमाग भी सुन्न हुआ है तब से 

Thursday, July 28, 2011

एक रात की बात हुई !

एक रात की बात हुई 
जब दुनिया से दूर 
कुछ पल वो मेरे साथ हुई

सुबह से आँखों में एक साया था 
पिछली रात का ख़वाब
खुमार बन के दिल दिमाग पर छाया था 

मेरे संग चल पड़ी थी वो 
मेरी हमसफ़र बन चली थी वो
सच में न सही, सपने में दो कदम बड चली थी वो 


दिल बेचान था बात करने को
आखें बेचान थी उसे देखने को
एक जुस्तजू  थी उसे गले लगाने को 


शाम आई 
साथ में कुछ पिछले जख्मों को कुरेद लाई
मेरी ख़ुशी के बीच उसे दर्द दे आई 

पता चला मेरे  दिल को, की
दस्तक इसने जहाँ  दी 
वहां अब भी कोई और बस्ता है 
 अब बेठे अपनी किस्मत पे हसंता है 

मगर फिर भी ...

एक  रात की बात हुई 
जब दुनिया से दूर 
कुछ पल को ही सही.... वो मेरे साथ हुई !
 


 











  

Saturday, July 9, 2011

Bachkani baatein

aaj yu bethe na jaane kaise
phir tum yaad aa gayi

dimag ne toh bhula diya kab ka tumhe
shayad dil ki yadasth ab bhi tej hai

dabi kitabon ke beech mein chupe woh khat tumahre
mere un khaton ke saath, jo sirf lifafon mein band reh gaye

padne betha hun aaj un pankhtiyon ko
jo meine kabhi likhi thi tumahre liye

bachpana jhalkta hai un mei
ye jaanta hun mein

muskura raha hun soche ki
ki kya sochti hogi tum

lekin ab udaas hun
ye jaan kar ki

meri in bachkani baaton par
hanse ke liye tum nahi

Friday, August 13, 2010

मत सोच


आज फिर बारिश ने दस्तक दी,
खिड़की पे बेठे मुझ को कुछ कहने की कोशिश की !
कहने लगी..

बंद दरवाजों, खिडकियों से देखकर न मुस्कुरा,
बहार आ, थोडा भीग और इस फासले को मिटा !
कब तक अपने को रोकेगा, उम्र की बंदिश में कब तक बंधेगा!

मत सोच की लोग क्या कहेंगे,
हँसेंगे तुझ पर,बातें कहेंगे !
नाच मेरे साथ की, गिरती बूंदों से तो छीटें हमेशा पड़ेंगे !

ज़रा वो बचपन याद कर,
10-12 साल पीछे जा,
बारिश में खेलते अपने आप से बात कर !

अब तो उठ, यह कलम छोड़,
अपनी रचना और शब्दों में बातें न कर,
मुहं मेरी ओर मोड़ !

देख काली घटा छटने लगी है,
घर चल मुझसे कहने लगी है,
अब पता नहीं कब, फिर से मैं बरसूँ
तेरे आलंगन में प्यासी, जीवन भर तरसूँ !

Tuesday, August 10, 2010

रात तेरा क्या है !

रात तेरा क्या है !
तू किसी को भी निगल सकती है 
कालिख पोत कर चहेरे पर
अपने में घुला सकती है 


तू चाहे तो क़दमों को बहका दे 
अँधेरे में ठोकर मार मंजिल से भटका दे 


रात तेरा क्या है !

Wednesday, June 9, 2010

चंद शब्द

ए जिंदगी ऐसे मोड़ पे खड़ा हूँ
की हर तरफ रास्ते ही रास्ते दीखते है
कौन सा चुनु वो रास्ता
जो मुझे तेरी और ले जाए


हजारों सपनों की बीच एक सपना मेरा भी
रात भर पहरेदारी पर हूँ की कहीं
टूट ना जाये

नाम में क्या रखा है
हर तरफ बदनाम है शराब
माना की जिगर जलाती है पर गम भी तो जलते है
ख़राब ही सही
पर शराब  जिंदगी जीना आसां करती  है

लोग कहते है हमारी नज्म में प्यार नहीं छलकता
कैसे बताएं उनको की
आज भी हम आपके उस "हाँ " का इंतज़ार कर रहे है