सोचता हूँ आज क्या लिखूं
कोई विचार गूंज नहीं रहा है
शब्दों की कमी नहीं है; मगर
ज़ेहन धोका दे रहा है
कई दिनों से अपने से लड़ रहा हूँ
अंतरद्वन्द की इस जवाला में जल रहा हूँ
जलते अरमानों से काले हुए हाथों से
कविता की कलम थामने में डर रहा हूँ
विचारों का सागर आज भाप बन के उड़ चला है
अब जाने न जाने कब ये फिर से
बादल बनके मेरी रचना पे बरसे
खिल उठे मेरी कविता की केयारी
और फिर से अरमानों के फूल महके
सोचता हूँ क्या होगा उस दिन
जब कभी विचारों की बगिया मुर्जाने लगेगी
थर थराते हाथों पर कलम का भार लिए
रचना की माला में शब्दों को पिरोहने की
एक नयी चुनोती जगेगी
डरता हूँ ये सोच के की
अकेला कैसे कटेगा हर पल
मेरी कल्पनाएँ भी मेरे साथ न होंगी
सिर्फ पुराने पन्नों बिखरे होंगे
जिन पर मेरी व्यक्तित्व की छाप होगी
4 comments:
good and deep one ! Thanks for sharing.
Thanks for appreciating !
Beautifully written :) I love it.
thanku baijal !
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