Thursday, April 8, 2010

सोचता हूँ

सोचता हूँ आज क्या लिखूं
कोई विचार  गूंज नहीं रहा है
शब्दों की कमी नहीं है; मगर
 ज़ेहन  धोका दे रहा है


कई दिनों से अपने से लड़ रहा हूँ
 अंतरद्वन्द की  इस जवाला में जल रहा हूँ
 जलते अरमानों से काले हुए हाथों से
कविता की कलम थामने में डर रहा हूँ


विचारों का सागर आज भाप बन के उड़ चला है
अब जाने न जाने कब ये फिर से
बादल बनके मेरी रचना पे बरसे
खिल  उठे मेरी कविता की केयारी
और फिर से अरमानों के फूल महके


सोचता हूँ क्या होगा उस दिन
जब कभी विचारों की बगिया मुर्जाने लगेगी
थर थराते हाथों पर  कलम का भार लिए
 रचना की माला में शब्दों को पिरोहने की
एक नयी चुनोती  जगेगी


डरता हूँ ये सोच के की
अकेला कैसे कटेगा हर पल 
मेरी कल्पनाएँ भी मेरे साथ न होंगी
सिर्फ पुराने पन्नों बिखरे होंगे
जिन पर मेरी  व्यक्तित्व की छाप होगी

4 comments:

Pramod said...

good and deep one ! Thanks for sharing.

BishtMohnish said...

Thanks for appreciating !

Unknown said...

Beautifully written :) I love it.

BishtMohnish said...

thanku baijal !