आज बेठा हूँ एकेला तो ना जाने
बचपन याद आता है !
कुछ बातें तो ज़ेहन में है पर
कुछ धुंदली यादों का पर्दा भी गहरा मालूम पड़ता है !
माँ बाबा से हमेशा यही पूछा
मैं बचपन में कैसा था ?
घूंटनों के बल चलता था या
दिन भर मिट्टी खाता था ?
बचपन के वो दोस्त ना जाने कहाँ गए
"पक्का दोस्त" , कच्चा दोस्त , तेरा दोस्त , मेरा दोस्त
कहते थे जो एक दूसरे को..
कट्टी कर ना जाने कहाँ रूठ के बैठ गए
गर्मीयों की छुट्टी के वो दिन
ना धूप की फ़िक्र ना चेहरे पे जलन
बस पैरों में चप्पल और जेब में कंचे लिए
निकल पड़ते थे मनचले अरमानों के संग
लट्टू सी थिरकती जिंदगी लिए
माँ बाप के सपनों
और समाज के तानों से बचने
के लिए अपने पैरों पे खड़े हुए
आज खड़े है अपने पैरों पर
भविष्य बनाने की बात करतें है
और जो सुनेहरा अतीत बीत गया
उसे इन शब्दों के जरिये याद करते है !
1 comment:
Lattoo si thirakti zindagi kae.. said it just right..
;)) self control acha hota hai laekhak sahab.. par itna b nahi ki kuch alfaaz kehne se pehle hi aapke zehan mein dafn ho jaaye ;))
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