आज फिर बारिश ने दस्तक दी,
खिड़की पे बेठे मुझ को कुछ कहने की कोशिश की !
कहने लगी..
बंद दरवाजों, खिडकियों से देखकर न मुस्कुरा,
बहार आ, थोडा भीग और इस फासले को मिटा !
कब तक अपने को रोकेगा, उम्र की बंदिश में कब तक बंधेगा!
मत सोच की लोग क्या कहेंगे,
हँसेंगे तुझ पर,बातें कहेंगे !
नाच मेरे साथ की, गिरती बूंदों से तो छीटें हमेशा पड़ेंगे !
ज़रा वो बचपन याद कर,
10-12 साल पीछे जा,
बारिश में खेलते अपने आप से बात कर !
अब तो उठ, यह कलम छोड़,
अपनी रचना और शब्दों में बातें न कर,
मुहं मेरी ओर मोड़ !
देख काली घटा छटने लगी है,
घर चल मुझसे कहने लगी है,
अब पता नहीं कब, फिर से मैं बरसूँ
तेरे आलंगन में प्यासी, जीवन भर तरसूँ !