Friday, August 13, 2010

मत सोच


आज फिर बारिश ने दस्तक दी,
खिड़की पे बेठे मुझ को कुछ कहने की कोशिश की !
कहने लगी..

बंद दरवाजों, खिडकियों से देखकर न मुस्कुरा,
बहार आ, थोडा भीग और इस फासले को मिटा !
कब तक अपने को रोकेगा, उम्र की बंदिश में कब तक बंधेगा!

मत सोच की लोग क्या कहेंगे,
हँसेंगे तुझ पर,बातें कहेंगे !
नाच मेरे साथ की, गिरती बूंदों से तो छीटें हमेशा पड़ेंगे !

ज़रा वो बचपन याद कर,
10-12 साल पीछे जा,
बारिश में खेलते अपने आप से बात कर !

अब तो उठ, यह कलम छोड़,
अपनी रचना और शब्दों में बातें न कर,
मुहं मेरी ओर मोड़ !

देख काली घटा छटने लगी है,
घर चल मुझसे कहने लगी है,
अब पता नहीं कब, फिर से मैं बरसूँ
तेरे आलंगन में प्यासी, जीवन भर तरसूँ !

4 comments:

P.N. Subramanian said...

बहुत सुन्दर रचना परन्तु वरतनियों में कुछ गड़बड़ी हो गयी है.

BishtMohnish said...

thank u Subramanian ji..8-9 saal baad wapis apni hindi pe likhne aaya hun..thodi gadbadi toh jayez hai :)

Anonymous said...

Beautifully simple!
like it!

BishtMohnish said...

thank you !