लकीरों और तकदीरों में अजब मेल होता है
हमारे हाथों में भी मुक्कमल खेल होता है
एक पतली सी रेखा बदलती है जिंदगानी का रुख
क्या कोई सच भी संगीन होता है
एक बार ह्रदय रेखा ने भाग्य रेखा से लड़ना चाहा
हकीक़त को छोड़ मोहब्बत में पड़ना चाहा
भाग्य रेखा लेकिन चुप न बेठी
हमें हकीक़त से नज़रें चुराने की सज़ा देने की ठानी
भावो के समंदर दिखाए
जज्बातों के सैलाब लाये
ये सब देख माथे की रेखा रो पड़ी
शिखन पड़ने लगी विचारों की
पहली बार उसने दिल का हाथ थामा
दिल के अल्हड़पन का कारण खुद को माना
पर देर हुई अब
भाग्य ने लिख दी कहानी सारी जब
दिल हार बेठा किस्मत से
दिमाग भी सुन्न हुआ है तब से