Thursday, December 13, 2012

आज फिर

आज फिर बहुत दिनों बाद
बेठा हूँ कागज, कलम और मदिरा के साथ
इस उम्मीद में की कुछ लिखूंगा

अब थोड़ा  सुरूर सा चड़ने लगा है
विचारों और ख्यालों का पोथा खुलने लगा है
अब शब्द कविता का रूप लेंगे



होश में ये दूनिया  बेमानी लगती है
छल कपट की धनि लगती है
इस पे भरोसा नहीं